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        नई चेतना, नई ऊर्जा का त्यौहार मनाएं......                           आओ नववर्ष मनाएं मयस्सर डोर से फिर एक मोती झड़ रहा है, तारीखोंं के जीने से दिसंबर उतर रहा है, कुछ चेहरे घटे, कुछ यादें जुड़ गई वक्त में, उमर का पंछी नित दूर-दूर उड़ रहा है, गुनगुनी धूप और ठिठुरती रातें जाड़े की, गुजरे लम्हों पर भी झीना झीना पर्दा गिरा रहा है,  जा़यका लिया नहीं जिंदगी का और फिसल रही है जिंदगी, आसमां समेटता वक्त, बादल बन उड़ रहा है, फिर एक दिसंबर गुजर रहा है........ हर साल हम यही सोचते हैं कि यह साल बहुत जल्दी बीत गया | साल का आखिरी महीना इसी उधेड़बुन में निकल जाता है कि जाता हुआ यह साल हमें क्या दे गया या हमसे क्या लेकर चला गया | हर साल की यही कहानी है, हर साल नया साल आएगा कुछ ना कुछ सिखाएगा जिंदगी की किताब में कुछ नए अध्याय जोड़ कर जाएगा और हम हर साल पुराने सालों की याद करेंगे | नए साल के बहाने हमें एक मौका मिलता है जब हम पीछे मुड़कर देख सकते हैं कि हमने अपने साथ क्या किया, अपने आस...
           अपनी समझ का इस्तमाल कीजिये विचारणीय ...... मुफ़्तख़ोरी की पराकाष्ठा! मुफ़्त ऋण मुफ़्त दवा, मुफ़्त जाँच, लगभग मुफ़्त राशन, मुफ़्त शिक्षा, बच्चा पैदा करने पर पैसे , बच्चा पैदा नहीं (नसबंदी)करने पर पैसे, स्कूल में खाना मुफ़्त ,  मुफ़्त बाँटने की होड़ मची है, पिछले दस सालों से लेकर आगे बीस सालों में एक एसी पूरी पीढ़ी तैयार हो रही है या हमारे नेता बना रहे हैं जो पूर्णतया मुफ़्त खोर होगी! अगर आप उनको काम करने को कहेंगे तो वो गाली देकर कहेंगे की सरकार क्या कर रही है! ये मुफ़्त खोरी की ख़ैरात कोई भी पार्टी अपने फ़ंड से नही देती टैक्स दाताओं का पैसा इस्तेमाल करती है! हम नागरिक नहीं परजीवी तैयार कर रहे हैं! देश का अल्प संख्यक टैक्स दाता बहुसंख्यक मुफ़्त खोर समाज को कब तक पालेगा ? जब ये आर्थिक समीकरण फ़ेल होगा तब ये मुफ़्त खोर पीढ़ी बीस तीस साल की हो चुकी होगी जिसने जीवन में कभी मेहनत की रोटी नही खाई होगी हमेशा मुफ़्त की खायेगा !नहीं मिलने पर, ये पीढ़ी नक्सली बन जाएगी , उग्रवादी बन जाएगी पर काम नही कर पाएगी ! सोचने की बात है कि सरक...
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        औरत भी...... मर्द भी.......   हर साल आप और हम 8 मार्च के दिन महिला दिवस को बहुत गंभीरता से मनाते हैं और अपने आस-पास मौजूद महिलाओं को उनके योगदान के लिए धन्यवाद करते हैं. ऐसे मौके पर कई पुरुष मजाकिया तौर पर पूछते हैं कि 'भई पुरुष दिवस भी होता है क्या'? उनके लिए जवाब है जी हां, और ये दिवस आज यानि 19 नवंबर को मनाया जाता है. 19 नवंबर 2017 के दिन अंतर्राष्ट्रीय पुरुष दिवस होता है. जानिए आखिर कब हुई इस दिन को मनाने की परंपरा की शुरुआत - 7 फरवरी 1992 के दिन मिसौरी यूनिवर्सिटी, अमेरिका के प्रोफेसर थॉमस योस्टर की कोशिशों के बाद पहली बार अमेरिका, कनाडा, यूरोप के कुछ देशों में कुछ संगठनों ने पहली बार अंतर्राष्ट्रीय पुरुष दिवस मनाया. हालांकि 1995 के ईवेंट में कम लोगों की दिलचस्पी के बाद से ही कई देशों ने फरवरी में ये दिन मनाना बंद कर दिया. काफी समय तक माल्टा ही इकलौता देश बचा था जो इस दिन को फरवरी में मनाता था. हालांकि अलग-अलग देश इस दौरान अपने हिसाब से पुरुष दिवस मना रहे थे. डॉ. जीरोम तिलकसिंह त्रिनिडाड एंड टोबेगो के वासी थे. उन्होंने फिर से बीड़ा ...
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                  रा से राम......रा से रावण...... आजकल हर त्योहार की शुरुआत होती है सोशल मीडिया और व्हाट्सएप पर शुभकामना संदेशों के आने से | नवरात्री और फिर दशहरा की शुरुआत भी ढेरों अलग-अलग तरह की शुभकामनाओं के संदेशों से हुई, संदेश बनाने वाले और सोचने वाले भी बहुत ही सृजनात्मक होते हैं | जैसे ही आज यह मैसेज देखा उस समय लगा कि क्रिएटिविटी की कोई हद नहीं है, इंसानी बुद्धि की सोच का कोई अंत नहीं है | तभी से बहुत तरह के विचार बार-बार ज़हन में आ रहे हैं, कितने साधारण रुप से लिखा है ! 'रा' से ही राम की शुरुआत होती है और 'रा' से ही रावण की लेकिन दोनों का अंत कितना अलग है ! हमारे जीवन में भी यह कितना कितना सटीक बैठता है, हम शून्य से शुरू करते हैं..... कोई दहाई तक पहुंचता है..... कोई सैकड़ा तक..... कोई हजार तक तो कोई लाख तक...... सब का अंत अलग अलग है | वास्तव में जीवन में महत्वपूर्ण क्या है ? शून्य से शुरुआत करना और अंत में आपके कर्म के पीछे, आपकी उपलब्धियों के पीछे कितने शून्य लगे हैं यह महत्वपूर्ण है यानी कि आप दस नंबरी हैं यह सौ नंबरी य...
  ऊचांई पर पहुंच कर क्या संवेदनाएं मर जाती हैं ?      हर चीज के दो पहलू होते हैं, 'गलती' भी एक ऐसी चीज है जिसके दो पहलू हैं, निकालनी हो तो सबसे आसान लगती है खुद को स्वीकार करना हो तो असंभव सा लगने लगता है | यह मानव स्वभाव है, जो हम दूसरे में सबसे पहले देखते हैं वह है उसकी गलती और जो हम खुद में सबसे पहले छुपाते हैं वह है अपनी गलती... खैर... यह स्वभाव है जिसे दूर करना मुश्किल है | बहुत कम ही ऐसे लोग है जो अपने व्यक्तित्व के दोनों पहलू देखते हों और वे अपवाद हैं | पिछले कुछ दिनों से लखनऊ का हत्याकांड देख रही हूं, पढ़ रही हूं, सुन रही हूं लेकिन कुछ समझ नहीं पा रही हूं | अभी तक जितनी भी रूपरेखा बनी है उससे तो हत्याकांड ही लग रहा है और कार्यवाही चल रही है लेकिन उससे भी ज्यादा कष्ट जिस चीज को देखकर हो रहा है वह यह कि कुछ पुलिस वाले सोशल मीडिया पर एडिटेड मैसेज चला रहे हैं,  कह रहे हैं कि या तो मुझे अनफ्रेंड कर दो या मेरी फ्रेंड लिस्ट से हट जाओ मेरा नंबर डिलीट कर दो... हर विभाग में यूनिटी होती है यह अच्छी बात है और होनी भी चाहिए लेकिन संवेदना नहीं मरनी चाहिए | पब्लि...
हर देश की अपनी एक विशेषता है, मेरे देश की विशेषता है इसकी भिन्नता| "परी हो तुम गुजरात की, रूप तेरा मद्रासी ! सुन्दरता कश्मीर की तुम में, सिक्किम जैसा शर्माती !! खान-पान पंजाबी जैसा, बंगाली जैसी बोली ! केरल जैसी आंख तुम्हारी, है दिल तो तुम्हारा दिल्ली !! महाराष्ट्र तुम्हारा फ़ैशन है, तो गोवा नया जमाना ! खुशबू हो तुम कर्नाटक की, बल तो तेरा हरियाणा !! सीधी-सादी उड़ीसा जैसी, एम.पी. जैसा मुस्काना ! दुल्हन तुम राजस्थानी जैसी, त्रिपुरा जैसा इठलाना !! झारखंड तुम्हारा आभूषण, तो मेघालय तुम्हारी बिन्दीया है ! सीना तुम्हारा यू.पी है तो, हिमाचल तुम्हारी निन्दिया है !! कानों का कुंडल छत्तीसगढ़, तो मिज़ोरम तुम्हारी पायल है, बिहार गले का हार तुम्हारा, तो आसाम तुम्हारा आंचल है !! नागालैंड- आन्ध्र दो हाथ तुम्हारे, तो ज़ुल्फ़ तुम्हारी अरुणाचल है ! नाम तुम्हारा भारत माता, तो पवित्र तुम्हारा उत्तरांचल है !! सागर है परिधान तुम्हारा, तिल जैसे है दमन-द्वीव ! मोहित हो जाता है सारा जग, रहती हो तुम कितनी सजीव !! अंडमान और निकोबार द्वीप, पुष्पों का गुच्छ तेरे बालों में ! झिल-मिल, झि...

खुद को परखें

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                                                                                          खुद को परखें अमूमन बचपन में हम सब के पास चाबी वाले खिलौने रहे होंगे अौर उसकी कार्य प्रणाली से भी हम सब वाकिफ हैं | इसका सीधा साधा फार्मूला है कि हमने चाबी भरी और उस खिलौने को चलाया, जितनी चाबी भरी उतना ही खिलौना चलता है, चाहे वह कलाबाज़ी करने वाला बंदर हो, ड्रम या झुनझुना बजाने वाला जोकर या कमर मटका कर नाचने वाली गुड़िया | वैसे हर खिलौने की क्षमता या कार्यप्रणाली खेलने वाले पर ही निर्भर होती है लेकिन चाबी वाले खिलौने मुझे बचपन से ही विचित्र मालूम होते थे | कहीं ऐसा तो नहीं कि मेरे अंदर यह विचार कहीं ना कहीं पनप रहा था कि आगे चलकर हमारी चाबी भी किसी और के हाथ में ना चली जाए ! और आज शायद हुआ भी वही | आज जो हम बनते जा रहे हैं वो दूसरों की ही देन है, क्योंकि हम जो वास्तविकत...